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devendrarai


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विकास और खुशहाली के नए ‘सूत्र’ देगा बिहार

Posted On: 2 Jan, 2016  
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माओवादियों से भिडऩा ममता की मजबूरी

Posted On: 16 Nov, 2011  
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चौतरफा करें अंधकार का नाश

Posted On: 12 Jan, 2011  
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…गंगासागर एक बार

Posted On: 9 Jan, 2011  
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देश में एक राहुल यह भी…

Posted On: 14 Dec, 2010  
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‘इलाका दखल’ का खूनी खेल

Posted On: 2 Dec, 2010  
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सवाल साख खोने-बचाने का

Posted On: 13 Nov, 2010  
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यह सब ठीक नहीं

Posted On: 8 Nov, 2010  
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यूं ही नहीं भुला सकते

Posted On: 7 Nov, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

बंगाल में एक कहावत आम है कि पति-पत्नी के बीच के झगड़े पार्टी ऑफिस में सुलझाये जाते हैं. यह कहावत अनायास ही प्रयुक्त नहीं होने लगा. इस तरह की अवधारणा के बीज विधानचंद्र राय के मुख्यमंत्रित्व के काल में ही सूबे में पड़े. वामपंथी दल सत्ता हासिल करने के लिए कांग्रेस से संघर्ष कर रहे थे. न केवल शहरी इलाकों में बल्कि सूबे के ग्रामीण इलाकों में भी गुंडो (मस्तानों) की गिरोहबंदी निरंतर मजबूत होती जा रही थी और उन मस्तानों को सत्ताधारी कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था. आये दिन गुटिय संघर्ष में बम बाजी और गोलियों की तड़तड़ाहट गलियों और खेत-खलिहानों में गूंजते थे. 'इलाका दखल' शब्द और उसके निहितार्थ उसी समय से प्रयोग में आने लगे. बाद में वाममोर्चा के सत्ता में आने के बाद इन मस्तानों को सरकारी संरक्षण में 'व्यवस्थित' किया गया और 'इलाका दखल' के निहितार्थ में तनिक संशोधन किया गया. जिसकी बानगी नंदीग्राम, सिंगूर और लालगढ़ की घटना में देश-दुनिया ने देखा है. अब सत्ता की दौड़ में वाममोर्चा को लखेदती हुई तृणमूल कांग्रेस वहां आ पहुंची है कि अब इसे भी 'इलाका दखल' की जरुरत आन पड़ी है. विधानचंद्र राय के समय में भी कांग्रेस ने 'इलाका दखल' की बात नहीं स्वीकारी थी और न ही अब वाममोर्चा या फिर तृणमूल कांग्रेस 'इलाका दखल' की बात स्वीकरती है. खैर, बेहतरीन आलेख के लिए बाधाई.

के द्वारा:

आपने सही कहा कि बहुत मुश्किल है, लेकिन यदि बार-बार सवाल उठे, गांव से लेकर शहर तक तीखी बहस छिडे और हुक्‍मरानों की घेराबंदी हो तो संभव है समस्‍या का निदान निकल आए। जहां तक नक्‍सलवाद का प्रश्‍न है तो अब यह पूरी तरह निरर्थक हो चला है। हिंसा के रास्‍ते किसी समस्‍या का समाधान नहीं निकाला जा सकता। उसमें भी नक्‍सली संगठन धीरे-धीरे आपराधिक गिरोह में तब्‍दील हो चले हैं। इनका कोई आदर्श नहीं। पर, जब तक नेतागण अपने राजनीतिक स्‍वार्थ का परित्‍याग नहीं करते और नौकरशाही ईमानदार नहीं बनती नक्‍सल समस्‍या के साथ अन्‍य तमाम समस्‍याएं व विसंगतियां मौजूद रहेंगी। बावजूद इसके हमें आशावादी होना चाहिए। प्रतिक्रिया के लिए आपको बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

के द्वारा:

देवेन्द्र जी आपने सही विषय पर चर्चा की है । नक्सली क्षेत्र का पहुंच मार्ग आज भी ध्वस्त है, इसका सबसे बड़ा कारण इस संगठन से मिलीभगत कर सरकारी सिविल अमले की लूट ही है, और कुछ नहीं । इससे दोनों की आर्थिक स्वार्थ सिद्धि भी हो रही है, और सुदूर के जंगल झाड़ सुरक्षा बलों की पहुंच से दूर होने के कारण इनके लिये मुफ़ीद भी बने हुए हैं । यहां कोई सोया हो तब न जगाया जाय! सभी सोने का नाटक करते हुए कम्बल ओढ़कर घी पीने में मस्त हैं । दो ही वर्ग हैं इन क्षेत्रों में, एक लूटने वाला वर्ग, जो आपसी साझेदारी के कारण बिना किसी डर-भय के अपने धंधे से लगा हुआ है, और दूसरा वह वर्ग जो शोषित होते हुए भी जानता ही नहीं कि उसका शोषण भी हो रहा है । अब जो इस योग्य ही नहीं है कि उसे अपने शोषित होने का भी ज्ञान हो, उसका क्या सोना और क्या जागना । जो थोड़ा भी जागरूक होकर दूसरों को जगाने लगता है, उसे या तो खरीद कर लुटेरी ज़मात अपने खेमे में शामिल कर लेती है, या फ़िर उसकी आवाज़ ही हमेशा-हमेशा के लिये खामोश कर दी जाती है । इस लुटेरे समुदाय में राजनीति, नौकरशाही, न्यायपालिका, माफ़िया और नक्सली सभी धड़े शामिल हैं । तेजतर्रार राज्यपाल अथवा किसी भी रूप में जैसे ही कोई ज़मीर वाला हरक़त में आता है, उसको घेर-घार कर ठिकाने लगा दिया जाता है । ठिकाने लगाने के तरीक़े भी खूब हैं । या तो राज्यपाल जिस पार्टी के नुमाइन्दे हैं, उसके लोग ही केंद्र को मजबूर कर वापस भेजवा दें, या जोड़तोड़ कर सरकार बना लो, स्वत: किनारे हो जाएंगे । बहुत मुश्किल है देवेन्द्र जी, बहुत मुश्किल है । साधुवाद ।

के द्वारा:

आपका आकलन सही है । चार दिन की चांदनी के बाद हमेशा की तरह उठापटक और भीतरघात का पुराना खेल शुरू होना अवश्यंभावी है । भानुमती के पिटारे से ईंट और रोड़े कुछ ही दिनों में उछल-उछल कर नाचते दिखेंगे, और फ़िर शुरू होगा अलग-अलग खेमों का मीट-भात एवं दही-चूड़ा सम्मेलनों का दौर । रघुवर जी को अभी फ़िलहाल तो किसी तरह ऊपर से ही ठेल धकेल कर किनारे कर दिया गया है, लेकिन बूढ़ सुग्गा ढेर दिन तक पोष मानेगा, इसमें भी संदेहे है । इधर लाल बत्तियों वाले हूटरों से मन भरने का देर है, और उधर दिलजलों के सीने पर जो इन आवाज़ों को सुनकर सांप लोट रहे हैं, उसके कारण सब्र का बांध टूटने भर की देर है । उसके बाद तो फ़िर वही तमाशा होना ही है । मधु जी की बात और थी । देह से टपकते मधु को चटा-चटा कर खींच ले गए थे, लेकिन सबके पास बांटकर खाने वाली कला कहां है? साधुवाद ।

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आदरणीय राय जी प्रणाम, यह तो अच्छे लोकतंत्र की पहचान है की वर्तमान पीढ़ी जागरूक होती जा रही है और अपने अनपढ़, भ्रष्ठ, लम्पट,माफिया, व्यभिचारी, दुष्ट , पैसे के पिस्सू नेताओं को पहचानने की कोशिस कर रही है यह भविष्य के लिए अच्छे संकेत हैं | जहाँ नौकरी की बात है साधारण चपरासी की नौकरी के लिए भी आठवीं कक्षा पास होना जरूरी है वहीँ मंत्री या राष्ट्रपति - प्रधान मंत्री जैसे नेताओं के लिए कोई शैक्षिक योगता की कोई जरूरत नहीं यह तो संविधान बनाने वालों ने इस देश के साथ धोका ही किया है - और यह केवल भारत में ही संभव है क्योंकि की " its can happen only in India " परन्तु यह अधिक दिनों तक चलने वाली बात नहीं है जब वर्तमान पीढ़ी देश को संभालेगी तो इस देश की तस्वीर ही कुछ और होगी ऐसा मेरा विश्वास है.|

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